सुनयना नाम की एक औरत की कहानी The story of a woman named Sunaina

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सुनयना नाम की एक औरत की कहानी The story of a woman named Sunaina

रूपयों पर अब अपना क्या हक।

नाम उसका सुनयना था, लेकिन वह देख नहीं पाती थी। वह भीख मांगती थी। शाम को घर पहुंचते ही दस वर्ष का बेटा मोहन दौडकर उससे चिपट जाता। भीख में मिले रूपये सुनायना जमीन के नीचे गडी एक हांडी में रखती थी।
एक दिन जब हांडी भर गई, तो उसने नगर के प्रसिद्ध और धर्मात्मा सेठ बनारसीदास के पास उसे जमा करवां दिया, ताकि भविष्य में काम आए। दो वर्ष बाद एक दिन सुनयना का बेटा बीमार पडा। दवा-दारू, झाड-फूंक और टोने-टोटके का भी कोई फायदा नहीं हुआ।
डाॅक्टरो से इलाज की बात आते ही वह पैसों के लिए सेठ जी के पास पहुंची। पर वहां बताया गया कि उसके नाम पर तो कुछ भी जमा नहीं है। निराश सुनयना लाठी टेकते हुए अपनी झोंपडी की ओर चल दी। बच्चे की दशा बिगडती गई। तभी सेठ को पता चला कि मोहन तो उनका ही खोया हुआ बेटा है।
वह बच्चे को सुनयना के पास से अपने घर ले गए। सुनयना चिखती-चिल्लाती उनके पीछे भागी, तो सेठ ने कहा की बच्चा मेरा है, यही एक बच्चा है। इसे बचाऊगां। दूसरे दिन सुबह तक वैद्य जी की दवा कारगर हुई।
मोहन को होश आया तो उसके जुबान से निकला, ’मां ’ चारो ओर अजनबी शक्ले देखकर उसने फिर आंखें बंद कर ली सेठ बनारसी दस के होश उडने लगे। सेठ तुरंत सुनयना के झोपडी तक दौड गए।
वहां देखा सुनयना फटे-पुराने टाट पर पडी रो रही है। सेठ ने कहा, बच्चा तुझे ही याद कर रहा है सुनयना।
मां को पास देख मोहन की दशा सुधरने लगी और धीरे-धीरे ठीक हो गई। सुनयना चलने लगी तो सेठ ने उसे रोकने की कोशिश की।
वह नहीं रूकी, तो उसे उसके रूपये लौटाने चाहे। सुनयना ने कहा वे रूपये मैंने मोहन के लिये जोड़ो थे उसी को दे देना।

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