तंत्र मंत्र विद्या

तंत्र मंत्र विद्या की पौराणिक कथा : इंद्र की सभा में एक अप्सरा नाचते-नाचते जब पृथ्वी पर बेहोश होकर गिर पड़ी तब तो चारों तरफ हलचल मच गई। तमाम देवता घबरा गए और इंद्र के तो क्रोध का ठिकाना ना रहा। उसकी सभा की नाचने वाले नर्तकी बेहोश होकर गिर पड़ी। इसमें इंद्र का अपमान था। चारों तरफ खोज की गई कि इसका कारण क्या है। पर कुछ भी मालूम ना हो सका लाचार होकर उन्होंने गुरुदेव बृहस्पति से शंका का समाधान करना चाहा।

बृहस्पति जी ने कहा राजन! लंका के रावण ने इस अप्सरा को बेहोश करके तुम्हारा अपमान किया है। इंद्रसभा और इंद्र देवता स्वयं ही इस उत्तर से बहुत भौचक्का रह गए। उन्होंने हाथ जोड़कर पूछा गुरुदेव रावण जी सभा में है नहीं और ना इस अप्सरा के कोई अस्त्र ही लगा है। जिससे उसे मूर्छित हो जाना चाहिए। गुरुदेव हंस पड़े और बोले अस्त्र बल से अभी तेरी बुद्धि आगे नहीं बढ़ी। अस्त्र मंत्र तंत्र यंत्र बल के आगे तुच्छ है। अस्त्रों का प्रयोग तो केवल सामने से ही किया जा सकता है। परंतु मंत्रों का प्रयोग सैकड़ों मील दूर बैठने पर उसी आसानी तथा उतनी ही अधिक प्रक्रम के साथ किया जाता है। इंद्र ने हाथ जोड़कर कहां महाराज आपकी इस कथा ने तो मुझे अधिक उत्तेजित कर दिया। आप मुझे इस विज्ञान के बारे में पूरा हाल बताएं।

इंद्र की जिज्ञासा देखकर बृहस्पति जी ने सारी बातें वर्णन करते हुए कहा। एक समय दशकंधर ने देवाधिदेव शिवजी की बहुत बड़ी तपस्या की भोले शंकर उससे बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे अपने पास बिठा लिया रावण ने शंकर जी से कुछ नहीं मांगा। इससे शंकर जी अधिक प्रसन्न हो गए थे। एक दिन जब रावण शंकर जी के पैर दबा रहा था और महादेव जी पार्वती के साथ लेटे थे तो उस समय पार्वती के बहुत कहने पर महादेव जी ने तांत्रिक विद्या के बारे में बताया कि मनुष्य की साधना से पैदा की हुई शक्ति अस्त्रों की शक्ति से कई गुना तेज और विशाल होती है। उसकी सिद्धि से कोई भी शक्ति मनुष्य का कुछ नहीं बिगाड़ पाती है। मंत्र का प्रयोग सैकड़ों मील की दूरी से भी इसी तरह के किया जा सकता है।

जिस प्रकार के शस्त्रों का प्रयोग आमने सामने से। महादेव जी के मुंह से यह वर्णन सुनकर तो रावण के मुंह में पानी आ गया और अपने मन में तांत्रिक विद्या के पूरी तरह सीखने का संकल्प उसने कर लिया रावण के मन की बात महादेव को जानते देर ना लगी उन्होंने सारे विद्या उसे सिखाई और कहा कि इस विद्या द्वारा वह संसार के अन्य कार्यक्रमों को भी पूरा करके यश प्राप्त कर सकता है। रावण ने उसी विद्या के प्रयोग से आज अप्सरा को मूर्छित कर दिया। इंद्र ने कहा गुरुदेव आप तो मेरे मन की बात तनिक देर ही मेरी जान लेते हैं।

मुझे भी इस विद्या को सीखने की बहुत इच्छा है। मैं भी चाहता हूं कि आप मुझे जिस तरह हो इस विद्या को सिखाने की चेष्ठा करें। गुरुदेव बृहस्पति हँसे और फिर बोले इंद्र तू अभी तक होड़ में रहा है यदि तेरी इतनी तीव्र इच्छा है तो मैं तुझे अवश्य ही तांत्रिक विद्या सिखा दूंगा तू अपने मन को स्थिर कर ले। इस बात को अच्छी तरह से समझ ले। कि इस विद्या को सीखने के लिए मनुष्य को काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, राग द्वेष इससे दूर रहना पड़ता है।

यह मनुष्य इसमें पूर्णता सफल हो जाता है। जो सादगी से जीवन व्यतीत करता हुआ इस विद्या को सीखना चाहे तो मुझे विद्या को सिखाने में कोई आपत्ति नहीं है। इंद्र बड़े सोच में पड़ गया मगर फिर हृदय कड़ा करके बोला महाराज मैं आपको विश्वास दिलाता हूं। कि जैसा आपने कहा है वैसा ही करुंगा। तमाम बातों से दूर रहकर ही मैं इन तांत्रिक विद्या को अवश्य सीखूंगा। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि जो कुछ भी आप कहेंगे मैं वैसा ही काम करुंगा।

बृहस्पति इंद्र का यह निश्चित देख कर कहा कि जिस प्रकार मैंने जगत गुरु श्री शंकर जी महाराज से यह अनुपम तांत्रिक विद्या सीखी है। वही तुझसे वर्णन करता हूं। इसके 6 प्रकार के कर्म है। शांति कर्म, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन तथा मारण। प्रयोग 9 तरह के हैं उनके नाम हैं मारण, मोहन, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण, यक्षिणी साधना और रसायन क्रिया।  tantra mantra yantra

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