प्रेतराज सरकार की आरती, Shri Pretraj Sarkar
Shri Pretraj Sarkar

प्रेतराज सरकार को दुष्ट आत्माओं को दंड देने वाले देवता के रूप मे पूजा जाता है। अत्यंत भक्ति भाव से उनकी आरती , भजन कीर्तन किये जाते हैं। प्रेतराज सरकार की बालाजी के सहायक देवता के रूप मे आराधना की जाती है। आमतौर पर चावलों का भोग लगवाया जाता है| यहाँ पर बूंदी के लड्डूओं का भोग भी लगाया जाता है।

|| चोपाई ||

गणपति की कर वंदना , गुरू चरनन चित लाय |
प्रेतराज जी का लिखूँ, चालीसा हरषाय |

|| श्री प्रेतराज चालीसा ||

जय जय भूतादिक प्रबल, हरण सकल दुख भार |
वीर शिरोमणि जयति , जय प्रेतराज सरकार |
जय जय प्रेत्राज जगपावन, महा प्रबल त्रय ताप नसावन |
विकट वीर करूणा के सागर , भक्त कष्ट हर सब गुण आगर |
रतन जडित सिहासन सोहे , देखत सुर नर मुनि मन मोहे |
जगमग सिर पर मुकुट सुहावना, कनन कुण्डल अति मनभावन |
धनुष कृपाण बाण अरु भाला, वीर वेष अति भृकुटि कराला |
गजारूढ संग सेना भारी, बाजत ढोल मृदंग जुझारी |
छ्त्र चँवर पंखा सिर डोले , भक्त वृंद मिल जय जय बोले |
भक्त शिरोमणि वीर प्रचण्डा, दुष्ट दलन शोभीत भुजदण्डा |
चलत सैन कांपत भूतलहूँ , दर्शन करत मिटत कलिमलहूँ |
घाटा मेहदीपुर मे आकर, प्रकटे प्रेतराज गुण सागर |
लाल ध्वजा उड रही गगन मे, नाचत भक्त मगन हो मन मे |
भक्त कामना पुरन स्वामी, बजरंगी के सेवक नामी |
इच्छा पुरन करने वाले , दुख संकट सब हरने वाले |
वो जिस इच्छा से आते है , वे सब मनवाछित फल पाते है |
रोगी सेवा मे जो आते , शीघ्र स्वस्थ होकर घर जाते |
भूत, पिशाच, जिन्न बेताला, भागे देखत रुप कराला |
भौतिक शारीरिक सब पीडा, मिटा शीघ्र करते है क्रीडा |
कठिन काज जग मे है जेते, रटत नाम पूरा सब होते |
तन मन धन से सेवा करते , उनके सकल कष्ट प्रभू हरते |
हे करुणामय स्वामी मेरे, पडा हुआ हूँ चरण सहारे |
या विधि अरज करे तन मन से , छूटत रोग शोक सब तन से |
मेहदीपुर अवतार लिया है, भक्तो का दुख दूर किया है |
रोगी पागल सान्ति हीना, भूत व्याधि अरु धन छीना |
जो जो तेरे द्वारे आते , मनवांछित फल पा घर जाते है |
महिमा भूतल पर छाई है, भक्तो ने लीला गाई है |
महंत गणेश पूरी तपधारी, पूजा करते तन मन वारी |
हाथो मे ले मुगदर घोटे , दूत खडे रहते है मोटे |
लाल देह सिन्दूर बदन मे, कापत थर- थर भूत भवन में |
जो कोई प्रेतराज चालीसा, पाठ करत नित एक अरु बीसा |
प्रतः काल स्नान करावै, तेल और सिन्दूर लगावै |
चंदन इत्र फुलेल चढावै, पुष्पन की माला पहनावै |
चंदन इत्र फुलेल चढावै, पुष्पन की माला पहनावै |
ले कपूर आरती उतारे, करे प्रार्थना जयति उचारे |
इच्छा पूरण करते जन की , होती सफल कामना मन की |
भक्त कष्ट हर अरि कुल घातक, ध्यान करत छूटत सब पातक |
जय जय जय प्रेताधिराज जय, जयति भूपति संकट हर जय |
जो नर पढत प्रेत चालीसा, रहत न कबहुँ दु:ख लवलेशा |
कह सुखराम ध्यानधर मन मे , प्रेतराज पावन चरनन में |

|| दोहा ||

दुष्ट दलन जग अध हरन, समन सकल भव शूल |
जयति भक्त रक्षक प्रबल, प्रेतराज सुख मूल |
कष्ट हरो सब जनन के , प्रेतराज बल धाम |
बसु निरंतर मम ह्रदय, कहत दास सुखराम |

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