कबीर दास के दोहे (Kabir Das ke dohe) विश्व में प्रसिद्ध  है।  लोग इनको पढ़ते है और सुनते है।  लेकिन बहुत काम लोग ऐसे होंगे जो इनको समझ कर अपने जीवन में अपनाये।  इन दोहो में बहुत ही अहम बात बताई गयी है।  लोक परलोक में अंतर बड़ी ही चतुराई से बताया गया है।  आज मैं ऐसे ही कबीर के दोहे का संग्रह  इस लेख में लिख रही हूँ।sant kabirdas, कबीर के दोहे का संग्रह

संत कबीरदास का संक्षिप्त जीवन परिचय

कबीर का जीवन-परिचय

sant kabirdasजन्म स्थान के बारे में विद्वानों में मतभेद है परन्तु अधिकतर विद्वान इनका जन्म काशी में ही मानते हैं, जिसकी पुष्टि स्वयं कबीर का यह कथन भी करता है।

"काशी में परगट भये ,रामानंद चेताये "
नामकबीरदास
माता का नामनीमा (एक राय निश्चित नहीं है )
पिता का नामनीरु (एक राय निश्चित नहीं है )
जन्मविक्रमी संवत 1455 (सन 1398 ई 0)
वाराणसी, (हाल ही में उत्तर प्रदेश, भारत)
कार्यजीविकोपार्जन के लिए कबीर जुलाहे का काम करते थे।
प्रमुख कृतिबीजक "साखी ,सबद, रमैनी"
मृत्युविक्रमी संवत 1551 (सन 1494 ई 0)
मगहर, (हाल ही में उत्तर प्रदेश, भारत)

संत कबीरदास के दोहे – Sant kabirdas ke Dohe

 कबीर के दोहेकबीर अमृतवाणी
1दोहाकहैं कबीर देय तू, जब लग तेरी देह| देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह
2दोहाबुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय| जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय|
3दोहापोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय|ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय
4दोहादेह खेह होय जायगी,;कौन कहेगा देह| निश्चय कर उपकार ही, जीवन का फन यह
5दोहासाधु ऐसा चाहिए; जैसा सूप सुभाय| सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय
6दोहाऐसी बनी बोलिये, मन का आपा खोय| औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय
7दोहातिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय| कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय
8दोहाजिही जिवरी से जाग बँधा; तु जनी बँधे कबीर| जासी आटा लौन ज्यों, सों समान शरीर
9दोहाधीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय| माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय
10दोहाजीवत कोय समुझै नहीं, मुवा न कह संदेश| तन–मन से परिचय नहीं, ताको क्या उपदेश
11दोहाबनिजारे के बैल ज्यों, भरमि फिर्यो चहुँदेश- खाँड़ लादी भुस खात है,बिन सतगुरु उपदेश
12दोहामाला फेरत जुग भया; फिरा न मन का फेर| कर का मनका डार दे; मन का मनका फेर
13दोहाजाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान - मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान
14दोहाबार-बार तोसों कहा, सुन रे मनुवा नीच - बनजारे का बैल ज्यों, पैडा माही मीच
15दोहाजैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय- जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी सोय

Kabir Das Ke Dohe Hindi –कबीर दास जी के दोहे 

कबीरदास के दोहे – चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह।
जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥

कबीरदास के दोहे – माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय॥

कबीरदास के दोहे – माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥

कबीरदास के दोहे – तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय ।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥

कबीरदास के दोहे – गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥

कबीरदास के दोहे – सुख मे सुमिरन ना किया, दु:ख में करते याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥

कबीरदास के दोहे – साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥

कबीरदास के दोहे – धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

कबीर के दोहे – कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

कबीर के दोहे – माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

कबीर के दोहे – रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥

कबीर के दोहे – दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥

कबीर के दोहे – बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥

कबीर के दोहे – साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥

कबीर के दोहे – तिनका कबहुँ ना निंदिये, जो पाँव तले होय ।
कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय ॥

कबीर के दोहे – जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥

कबीर के दोहे -उठा बगुला प्रेम का तिनका चढ़ा अकास।
तिनका तिनके से मिला तिन का तिन के पास॥

कबीर के दोहे – सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥

कबीर के दोहे – साधू गाँठ न बाँधई उदर समाता लेय।
आगे पाछे हरी खड़े जब माँगे तब देय॥

कबीर के दोहे – माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दें, मन का मनका फेर ॥

कबीर के दोहे – लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥

कबीर के दोहे – जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।

कबीर के दोहे – जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥

कबीर के दोहे – कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।
जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥

कबीर के दोहे – जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥

कबीर के दोहे – पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥

कबीर के दोहे – गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच ।
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच ॥

कबीर के दोहे – कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥

कबीर के दोहे – धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

कबीर के दोहे – माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय ।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥

कबीर दास जी के दोहे – Kabir Ke Dohe

Kabir Ke Dohe– दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार ।
तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥

Kabir Ke Dohe – आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर ॥

Kabir Ke Dohe – माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

Kabir Ke Dohe – शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान ।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥

Kabir Ke Dohe – काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥

Kabir Ke Dohe – रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीना जन्म अनमोल था, कोड़ी बदले जाय ॥

Kabir Ke Dohe – नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग ।
और रसायन छांड़ि के, नाम रसायन लाग ॥

Kabir Ke Dohe – जहाँ आपा तहाँ आपदां, जहाँ संशय तहाँ रोग ।
कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग ॥

Kabir Ke Dohe – माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख ।
माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख ॥

Kabir Ke Dohe – माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय ।
भगता के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय ॥

Kabir Ke Dohe – आया था किस काम को, तु सोया चादर तान ।
सुरत सम्भाल ए गाफिल, अपना आप पहचान ॥

Kabir Ke Dohe – गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपणे, गोबिंद दियो मिलाय॥

Kabir Ke Dohe – गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि ।
बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि॥

Kabir Ke Dohe – सतगुरू की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार।
लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावणहार॥

कबीर के लोकप्रिय दोहे

गुरु किया है देह का, सतगुरु चीन्हा नाहिं ।
भवसागर के जाल में, फिर फिर गोता खाहि॥

शब्द गुरु का शब्द है, काया का गुरु काय।
भक्ति करै नित शब्द की, सत्गुरु यौं समुझाय॥

बलिहारी गुर आपणैं, द्यौंहाडी कै बार।
जिनि मानिष तैं देवता, करत न लागी बार।।

कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥

जो गुरु ते भ्रम न मिटे, भ्रान्ति न जिसका जाय।
सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय॥

यह तन विषय की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान॥

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कबीर के दोहे – Kabir Ke Dohe

गुरु लोभ शिष लालची, दोनों खेले दाँव।
दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पाथर की नाँव॥

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