हम किस दौड़ में हैं? What are we running?

रूस में एक किसान था, जिसके पास एक छोटा सा प्लॉट था। उसकी उसकी जिंदगी बड़ी शांति और संतोष से कट रही थी पर एक दिन उसे अपनी पत्नी के भाई से ईर्ष्या हो गई जो जो की एक जमींदार था उसने देखा की उसका साला नई नई जमीं खरीद रहा था और उसे किराये पर देता जा रहा था। जैसे जैसे वह अमीर होता गया, किसान में अमीर बनाने की इच्छा और बलवती होती गई। उसने पैसे बचने शुरू कर दिए ताकि कोई जमीं खरीद सके
जब किसान के पास काफी पैसा जमा हो गया तो उसने खरीदने के लिए जमीं ढूँढनी शुरू कर दी। उसने सुना की पास के इलाके में कोई सस्ती जमीं है। जब वह यात्रा करके जमीं देखने पहुँचा तो उसने पाया की उस जगह रहने वाले लोग खानाबदोश थे।
उस इलाके के मुखिया के लिए किसान ने कुछ उपहार खरीदे। मुखिया ने उपहारों के लिए उसका धन्यबाद किया और कहा कि वह पैदल चलकर जितनी भी जमीं सूर्यास्त से पहले नाप लेगा, वह वो पूरी जमीं ले सकता है। समझौता यह हुआ कि किसान सुबह चलना शुरू करेगा और सूर्यास्त से पहले जितनी भी बड़ी जमीन का हिस्सा पैदल चलकर वह घेर लेगा- वह उसका हो जाएगा।
किसान इस बात कि संभावना से फूल नहीं समय कि वह जमीन के बहुत बड़े हिस्से का मालिक बन सकता है। समय-सिमा में बँधी इस दौड़ को देखने के लिए लोग इकठ्ठे हो गए। उसने बहुत तेज चाल से इसकी शुरूवात कि ताकि वह ज्यादा जमीन नाप सके। जब सूर्य आसमान में चढ़ चूका था। तो गर्मी बहुत ताज थी। किसान भोजन और पानी के लिए रूककर एमी बर्बाद नहीं करना चाहता था ताकि वह थोड़ी और जमीन पाने का मौका न गवां दे। उसने सोच कि अगर वह ऐसे ही चलता रहा, तो उसे ज्यादा जमीन मिल जाएगी। किसान एक वृत्त में चलकर, बड़े से बड़े क्षेत्रफल को घेरने कि कोशिश कर रहा था, जोकि अंत में बहुत लंबी दूरी बैठ गई।
वह इतना लालची हो गया कि जब सूर्य गर्म से और गर्म होता गया, उसने पानी के लिए भी रूकने से मना कर दिया। उसकी लातें थकती चली गई पर उसने कुछ क्षणों के लिए भी आराम करने से मना कर दिया। अंत में सूरज छुपने वाला था। भीड़ ने उसके विजय के लिए ताली बजानी शुरू कर दी। जैसे ही वह शुरू के स्थान पर पहुँचा, प्यास और थकान से वह इतना कमजोर हो चूका था कि वह वहीँ गिर पड़ा। इससे पहले भीड़ को समझ में आता कि क्या हुआ है, वह थकन और प्यास से भर चूका था।
दुखी मन से- लोगों ने उसके दफन कि तैयारी की। उन्होंने उसे वहीँ दफनाया जहाँ वह बेहोश होकर गिर पड़ा था। इस प्रकार उसे छः फुट लंबी एवं चार फुट चौड़ी जगह की जरूरत थी जिसमे की उसका शरीर दफनाया जा सके।
लालच की यह दुःख भरी कहानी, पृथ्वी पर अनेक लोगों के जीवन से बहुत अलग नहीं है। अधिकतर लोग क्या करते है ? वे अपना जीवन एक दौड़ में गुजरते हैं ताकि जितना सम्भव हो, उतने पैसे कमा सके, जितना सम्भव हो, उतनी जमीन-जायजाद कमा सके- जितना सम्भव हो उतना नाम-प्रसिद्धि कमा सके या जितना सम्भव हो उतनी सत्ता कमा सके; पर वह पते हैं की यह दौड़ उनकी मृत्यु के साथ खत्म हो जाती हैं।
जब लोग सिर्फ जड़ पदार्थों को इकठ्ठा करने के लिए इस संसार में जीवन यापन करते हैं तो एक-आध ही जीवन में संतोष पता हैं। लोग सोचते हैं कि एक समय आएगा जब उनके पास इतना होगा कि वे आराम से बैठकर- अपनी मेहनत के फल का आनद ले सकेगें। पर अधिकतर लोग, वह शान्ति पाने से पहले, इस संसार से चल बसते है।
यह संसार एक दौड़ के जैसा है। कुछ लोग इसे चूहा-दौड़ कहते है। हम एक Treadmill  (पौवा-चक्की) या एक पहिये पर तेज भागते है पर कहीं नहीं पहुँचते हैं। इससे पहले हम जान पाएं, सिटी बज जाती है और दौड़ का समय पूरा हो जाता है।
किसान तब तक संतुष्ट था- जब तक उसे दूसरों कि जमीन-जायजाद से ईर्ष्या नहीं थी फिर उसने वह दौड़ दौड़नी शुरू की- जिसका अंत उसकी मृत्यु से हुआ।

कुछ एक लोग ही महसूस करते है कि शान्ति और संतोष हमें आसानी से प्राप्त हो सकते है; वे पहले से ही हमारे अंतर में है। आगे हम स्थिर रहकर, अंतर में प्रवेश करें तो पृथ्वी पर मौजूद किसी भी ज्यादा खजाने से ज्यादा खजाने हमें प्राप्त होगें। हमें इनको पाने के लिए मेहनत करने की जरूरत नहीं है। हम अपनी दैनिक दिनचर्या जी सकते हैं जैसे ईमानदारी से अपनी रोजी-रोटी कमाना, अपने परिवार कि देखभाल करना और दूसरों के साथ मिल बॉंटकर खाना, और यह सब करते हुए भी हम अपने अंतर में शांति और संतोष का आनद ले सकते हैं। हमें बहरी धन-सम्पत्ति खोजने के लिए अंतर कि शन्ति त्यागने कि जरूरत नहीं : क्या पता बहरी सम्पत्ति मिले या न मिले या यह हमें वह ख़ुशी दे या न दे, जो हम सोचते हैं कि यह हमें देगी।

किसान ने आराम के लिए या कुछ पीने के लिए एक क्षड़ भी नहीं निकाला। ऐसे ही, क्या हम अपनी जिंदगियों में आध्यात्मिक विश्राम के लिए या अंतर में मौजूद अमृत के जगारने से पीने के लिए कुछ क्षड़ निकलते हैं ? हमारे अंतर में आनद, प्रेम और शान्ति का श्रोत मौजूद हैं। क्या कभी हम एक क्षड़ रूककर, इससे अमृत पीते हैं
आओ हम किसान के जैसे ना बनें। आओ हम हर रोज निकालकर, ध्यानाभ्यास में बैठें और अंतर में मौजूद दिव्य खजानों के झरने से अपनी आप को तरो-तजा कर लें। इस प्रकार, प्रभु प्रेम से हमारी प्यास बुझ जायगी और रोजमर्रा के कामकाज करते हुए हम प्रेम एवं शांति से भरे रहेंगे। हम अपनी सांसारिक लक्ष्यों को शांत रह कर पा लेंगे और हम आंतरिक आनद से औतप्रोत रहेंगे जिससे हमारी जिंदगी खूबसूरत हो जाएगी।

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