थॉमस : हर के बाद जीत Thomas: After every victory

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थॉमस : हर के बाद जीत Thomas: After every victory

थॉमस एडिसन ने बिजली के बल्ब का आविष्कार किया था। अगर यह उत्तम आविष्कार नहीं हुआ होता तो हम अनुमान लगा सकते हैं कि हमारी जिंदगी कैसी होती। बिजली के बल्ब से यह सम्भव हो स्का कि हम रात में भी गातिविधियाँ कर सकें जो कि युगों युगों से अक्सर दिन में ही सम्भव हो पति थी। मोमबत्ती और आग में रौशनी देने कि क्षमता सीमित होती हैं।
चाहें हम इस आविष्कार को बहुत आसान समझे परइसके लिए लगातार कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। यह कहा जाता हैं कि एक आलोचक ने यह कहकर एडिसन का अनादर करना चाहा कि वह ” स्टोरेज बैटरी ” के साथ किये गए अपनी पारीक्षणों में 25000 बार फेल हो चूका हैं।
महान एडिसन ने उत्तर दिया ” नहीं, मैंफेल नहीं हुआ हूँ। मैंने 24-999 तरीके खोजे हैं जो ‘ स्टीरेज बैटरी पर काम नहीं करते हैं ”
एडिसन के अडिग रहने से आश्चर्यजनक आविष्कार हो सकें। असफलता के प्रति उनके दृष्टिकोण ने ही उन्हें सफलता दिलाई। वे असफलता को सिखने का एक अवसर मानते थे जोकि उन्हें सफलता कि ओर लें जाता था। अगर उन्होंने पहली, दसवीं, सौवीं या 24,999 वीं कोशिश के बाद छोड़ दिया होता तो वे कभी सफलता नहीं होते
असफलता के प्रति एडिसन के दृष्टिकोण को हम स्वंय के आध्यात्मिक जीवन पर लागू कर सकते हैं, जिसमे प्राथना और ध्यानाभ्यास शामिल हैं। अनेक ब्यक्ति प्रतिदिन ध्यानाभ्यास और प्राथना में बैठते हैं पर कई बार वे निरुत्साहित हो जाते हैं। अगर वे ध्यानाभ्यास के दूसवें दिन तक अपनी आध्यात्मिक लक्ष्य पर नहीं पहुँच पाते हैं। अपनी लक्ष्य पर अडिग रहने और अपनी ध्यानाभ्यास पर ठीके रहने के बजाय, कई लोग इसे छोड़ देते हैं। वे समझते हैं कि अगर उनका लक्ष्य तुरन्त नहीं मिलता हैं तो वे असफल हैं। यह दृष्टिकोण उन्हें बहुत जल्दी छोड़ देने पर मजबूर कर देता हैं। आगे एडिसन ने बिजली का बल्ब बनाने के लिए 25000 बार कोशिश की जब तक कि सदल नहीं हो गया- तो क्या क्या हम आंतरिक बल्ब जलने के लिए 25000 बार ध्यानाभ्यास में नहीं बैठ सकते ?
असफलता से हमें निरुत्सहित नहीं होना चाहिए। अगर हम ध्यानाभ्यास में बैठें और हमें ज्योति आती-जाती दिखाई दे या हमें कुछ रंगों की ज्योति दिखे तो हम निराश न हों- ये प्राथमिक कदम हैं। मियमित रूप से बैठने से हम ध्यानाभ्यास में निपुण हों जायेंगे। हमें कोई अन्दाजा नहीं हैं कि ध्यानाभ्यास में बीत हर एक मिनट हमारे लिए कितना लाभदायक हैं। या हों सकता हैं- हमें अपनी तरक्की अभी नहीं दिखाई दे पर जो सभी घंटे और मिनट हमने ध्यानाभ्यास में गुजारे हैं- उन सबका मिलकर असर होता हैं। अगर हम छोड़ देते हैं क्योंकि एक दिन हमें कुछ नहीं दिखाई दिया, एक अन्य दिन ज्योति के बिन्दु दिखे और तीसरे दिन हल्की नीली ज्योति दिखी, तो हों सकता हैं, हम वह महान दिन नहीं देख पाएं जब हम अपनी गन्तव्य पर पहुँचकर तीव्र चमकदार ज्योति से भर जाएगें।
एडिसन जैसा बनाने के लिए लग्न कि जरूरत हैं। इसका अर्थ हैं कि जिस दिन भी हम सोचें कि हम असफल रहें, हम समझे कि हम यह सबक सीख रहें हैं, ज्योति ना दिखाई दे तो हमें विचार करना चाहिए कि क्या हमने सही तकनीक इस्तेमाल की हैं। क्या ध्यानाभ्यास के बाजय हम अपनी भूतकाल या भविष्य के विचारों में ब्यस्त थे ? हर असफलता एक अवसर हैं, अगली बार बेहतर करने का। हम 24-999 वे चीजें जान जायेंगे जो हमें अपनी ध्यानाभ्यास में नहीं करनी हैं। 25000 वीं बार हम अंततः सही प्रकार से ध्यान टिकाने का तरीका जान सकते हैं और तब हमें चमचमाती ज्योति की बौछारों का वरदान प्राप्त होगा।
जब हम ध्यानाभ्यास और प्राथना में बैठें, हम निरुत्साहित न हों, हम अपनी ओर से उचित प्रकार से ध्यानाभ्यास करें और बाकि प्रभु पर छोड़ दें। तब, एक दिन हम पाएँगे कि हमारी साड़ी कोशिश सफल होंगी और हम वह स्विच खोज लेंगे जिससे हम अपनी अंतर के ” बिजली के बल्ब ” को सदा के लिए जला सकेंगे।

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